तीसरी सरकार के रूप में पंचायत

  • आजादी के बाद जब देश का संविधान बनना तय हुआ, तभी महात्मा गाँधी ने जमीनी स्तर पर आजादी व लोकतंत्र को आम आदमी के जीवन का उपयोगी अंग बनाने के लिए पंचायत को आधार के रूप में लेने की बात की थी। लेकिन कुछ कारणों से यह संभव नहीं हो सका। संविधान सभा की एक लम्बी बहस के बाद, इस विषय को भविष्य के लिए छोड़ते हुए नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत शामिल करके राज्यों के खाते में डाल दिया गया, परन्तु साथ ही संविधान सभा ने पंचायत को एक नई संवैधानिक पहचान देते हुए इसे Self-Government अर्थात अपनी सरकार के रूप में चिह्नित किया।
  • 26 जनवरी, 1950 को भारत का जो संविधान लागू हुआ, उसमें दो सरकारों का प्रावधान किया गया। संविधान के भाग 5 में संघ अर्थात् केंद्र सरकार का विवरण तथा भाग 6 में राज्य सरकार का विवरण है। इस प्रकार पहली सरकार केन्द्र सरकार तथा दूसरी सरकार राज्य सरकार है। एक लम्बे समय अर्थात् 1995 तक इन्हीं दोनों सरकारों के द्वारा देश का शासन चलता रहा। वर्ष 1992 में 73वें संविधान संशोधन के द्वारा एक और सरकार का प्रावधान किया गया। संविधान के भाग 9 के अन्तर्गत पंचायत व 9क के अन्तर्गत नगरपालिका के रूप में Self-Government अर्थात् ‘अपनी सरकार’ का प्रावधान किया गया। नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत अनुच्छेद 40 में भविष्य की जो संकल्पना की गई थी, एक तरह से उसे ही समय और परिस्थिति की माँग एवं दबाव के फलस्वरूप मूर्तरूप देना पड़ा।
  • इस प्रकार पंचायतों को Self-Government अर्थात् ‘अपनी सरकार’ के रूप में पूर्ण संवैधानिक दर्जा देकर देश में नए सिरे से तीसरी सरकार की स्थापना की गई। इस अपनी सरकार की आवश्यकता और माँग आजादी से पहले व आजादी के बाद देश के सभी प्रमुख राष्ट्र-निर्माताओं एवं सामाजिक विचारकों द्वारा बराबर की जाती रही है। 1992 में 73वें संविधान संशोधन के द्वारा ही इसे पूरा करना अब संभव हुआ है।
  • 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज के माध्यम से आम आदमी की सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी का प्रयास करते हुए ‘पंचायती व्यवस्था’ को अपनी सरकार का दर्जा दिया गया है और इसके लिए कई महत्त्वपूर्ण प्रावधान भी किए गए हैं। जैसे, संविधान में विभिन्न स्तरों पर दायित्वों के निर्धारण के क्रम में 11वीं अनुसूची का निर्माण, स्थानीय निकायों के चुनावों को नियमित एवं व्यवस्थित करने के लिए राज्य चुनाव आयोग का गठन, संसाधनों को निश्चित करने के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन, गाँव स्तर से लेकर जिला स्तर तक स्थानीय आवश्यकता और माँग के अनुसार योजना निर्माण हेतु जिला योजना समिति का गठन, ‘पंचायत व्यवस्था’ को पूर्ण संवैधानिक मान्यता (जिससे राज्यों के लिए यह एक बाध्यकारी प्रावधान हो) तथा तीसरी सरकार को चरितार्थ करने के लिए चर्चा और निर्णय हेतु ‘ग्राम सभा’ को संवैधानिक दर्जा।

73वाँ संविधान संशोधन : खास-खास बातें

  • 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती राज व्यवस्था का जो स्वरूप निर्धारित किया गया, उसे नए पंचायती राज के रूप में पूरे देश में प्रसारित-प्रचारित किया गया। निर्धारित समयावधि के भीतर अधिकांश राज्यों ने अपने-अपने अधिनियमों में संशोधन किये और नये पंचायती राज की विधिवत् घोषणा की। यह संविधान संशोधन भारतीय इतिहास में एक क्रांतिकारी घटना के रूप में चिह्नित किया गया है। सच्चा लोकतंत्र और असली आजादी के सपनों के साथ पिरोकर इस प्रयास का ताना-बाना बुना जा रहा है। अब तो धीरे-धीरे एक लम्बा अर्सा बीत चुका है इसको लागू हुए।
  • जैसा कि सर्वविदित है कि संविधान के अनुच्छेद 40 (नीति निर्देशक सिद्धान्त) में कहा गया है; राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठायेगा और उनको ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त सरकार (Self-Government) की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों। लेकिन यह नीति निर्देशक वाक्य राज्य सरकारों के लिए सिर्फ सलाह का विषय बनकर रह गया था। उनके लिए बाध्यता नहीं थी। 73वें संविधान संशोधन ने एक सीमा तक उन्हें इसके लिए बाध्य कर दिया है। पंचायतों को अब संवैधानिक दर्जा मिल गया है। संविधान के भाग 8 के पश्चात् भाग 9 जोड़कर उसमें अनुच्छेद 243 को समाविष्ट कर राज्य सरकारों को पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के लिए बाध्य कर दिया गया है। इसी के साथ उसके स्वरूप और विस्तार को भी स्पष्ट किया गया है, जिसके अनुसार ही व्यवस्था लागू किया जाना है। इस संशोधन के अन्य प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं—
  1. पूरे देश में ढाँचागत एकरूपता लाने के लिए त्रिस्तरीय गाँव, मध्यम (ब्लॉक) तथा जिला पंचायत व्यवस्था लागू की गई।
  2. कार्यकाल पाँच वर्ष का होगा। कार्यकाल समाप्ति के  बाद 6 माह के भीतर चुनाव अनिवार्य होगा। इस व्यवस्था को नियमित एवं निष्पक्ष तथा सुचारु रूप से संचालित करने के लिए एक संवैधानिक संस्था राज्य निर्वाचन आयोग का प्रावधान किया गया है।
  3. सभी स्तरों पर पंचायत के सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा निर्वाचन से होगा। जनसंख्या के आधार पर समान अनुपात के अनुसार निर्वाचन क्षेत्र घोषित होगा।
  4. सभी स्तरों पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए उस क्षेत्र में उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीट आरक्षित होगी।
  5. महिलाओें के लिए भी सभी स्तरों की पंचायतों में कुल सीटों का एक तिहाई भाग आरक्षित होगा। यह व्यवस्था प्रधान/प्रमुख/अध्यक्ष के पद हेतु भी होगी।
  6. पिछड़े वर्गों के आरक्षण का मुद्दा राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ा गया है।
  7. संसाधनों की समुचित व्यवस्था हेतु वित्त आयोग का गठन तथा आडिट की समुचित व्यवस्था।
  8. ग्राम पंचायत स्तर से लेकर जिला स्तर तक जन भागीदारी के साथ योजना बनाने के लिए जिला योजना समिति के गठन का प्रावधान, इसी क्रम में 74वें संविधान संशोधन में किया गया है।
  9. ग्यारहवीं अनुसूची के माध्यम से विकास के 29 विभागों के कार्य पंचायतों के सुपुर्द किये गये।
  10. सभी स्तर की पंचायतों के चुनाव में भाग लेने हेतु प्रत्याशियों की एक निश्चित आयु सीमा 21 वर्ष का निर्धारण।
  11. ग्राम स्तर पर ग्राम सभा का गठन अनिवार्य होगा। ग्राम से संबंधित मतदाता सूची में पंजीकृत व्यक्तियों से मिलकर यह निकाय गठित होगा। इस बात का निर्देश है कि राज्य के विधानमण्डल द्वारा कानून बनाकर ग्राम सभाओं को अधिकार प्रदान किये जायेंगे।
  • इस प्रकार 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से कुछ इस तरह का प्रावधान किया गया जिससे पंचायती राज व्यवस्था को एक निश्चित एवं अधिकार-सम्पन्न अपनी सरकार के रूप में विकसित किया जा सके। आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य निश्चित किया गया।

पंचायतों की जमीनी सच्चाई

(विसंगतियाँ और अन्तराल)

  • नये पंचायतीराज के लागू होने के लगभग 20 वर्ष के बाद जो अनुभव सम्बन्धित राज्यों से जमीनी सच्चाई के रूप में उभर कर सामने आये हैं उससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार व समाज, दोनों स्तरों पर विचार और व्यवहार के बीच कई तरह की विसंगतियाँ हैं, जिसके कारण भटकाव की स्थिति बनी है। लोगों के बीच जो आक्रोश या निराशा का अंतर्द्वन्द्व देखने को मिला, उसने इस बिन्दु पर गम्भीरता से विचार करने के लिए बाध्य किया है। विचार और व्यवहार के बीच का अन्तराल और विसंगति कई बार एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में भी सामने आती है लेकिन इसे जितना भी कम किया जा सके लक्ष्य की प्राप्ति उतनी ही आसन हो जाती है। इसी अर्थ में पंचायती राज के संदर्भ में अन्तराल और विसंगतियों को पहचानने की कोशिश की गई है, जो इस प्रकार है—
  1. पंचायती राज का जो लक्ष्य महात्मा गाँधी से लेकर राजीव गाँधी तक विभिन्न रूपों में निर्धारित हुआ है, आज जब पंचायती राज लागू हुआ तो उसमें कई जगहों पर भटकाव है। बापू ने ग्राम स्वराज्य का लक्ष्य निर्धारित किया था तो पंडित नेहरू ने प्रारम्भ में प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण को ही आधार बनाया। बाद के दिनों में वे उसे लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण के रूप में विकसित करने की बात करने लगे थे। लोक नायक जयप्रकाश ने इससे भी आगे बढ़कर सहभागी लोकतंत्र के रूप में इसे प्रतिष्ठित करना चाहा तो समाजवादी चिन्तक डा. राममनोहर लोहिया ने चौखंभा राज्य के रूप में इसको पहचान दी। जहाँ विनोबा ने पंचायतों के माध्यम से गाँव जीवन को ग्राम परिवार भावना के साथ विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया वही संविधान निर्माताओं ने पंचायतों को ग्राम गणतंत्र की पुनर्स्थापना के आधार के रूप में चिह्नित किया था।
  2. आजादी के लगभग 40 वर्षों में सत्ता के स्तर पर जो विकृतियाँ उभर कर आईं उसको महसूस करते हुए राजीव गाँधी ने आम आदमी को वास्ताविक सत्ता सौंपने के लक्ष्य के साथ नये पंचायती राज का सपना सँजोया। संविधान संशोधन की असफल कोशिश के बीच सत्ता को दलालों से मुक्त करने का उनका अभियान तो अधूरा रह गया लेकिन बाद के दिनों में 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से अपनी सरकार (Self-Government) के रूप में ग्राम पंचायतों को विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
  • ये सभी लक्ष्य एक तरह से क्रमिक विकास के पक्ष में देखे जा सकते हैं। प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण का ही अगला चरण लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण है और इसी से अपनी सरकार की शुरुआत होगी। इसका जब और विकसित स्वरूप आगे आयेगा तो सहभागी लोकतंत्र के रूप में जन-सामान्य को वास्तविक रूप से सत्ता में भागीदार बनाया जा सकेगा, तभी जा करके ग्राम स्वराज्य का सपना साकार होगा। ग्राम स्वराज्य को तभी स्थायित्व मिलेगा जब ग्राम गणतंत्र की व्यवस्था गाँवों में कायम की जा सकेगी। इस प्रकार सभी लक्ष्य एक दूसरे के क्रमिक विकास और पूरक हैं।
  • लेकिन आज की तारीख में विकास का यह क्रम या तो ठीक से शुरू नहीं हो पा रहा है या फिर भटकाव की स्थिति में है। वर्तमान समय में जो जमीनी सच्चाई देखने को मिल रही है, उससे लगता है कि लक्ष्य की प्राप्ति में भी कई तरह की विसंगतियाँ आड़े आ रही हैं। जिसमें अपनी सरकार की सही समझ का अभाव, तीसरी सरकार का झूठा दावा, गाँव समाज की टूटन, आधारभूत स्तर पर निर्णय के अधिकार का न होना, पंचायत प्रतिनिधियों में क्रियान्वयन की अपेक्षित क्षमता और कौशल का अभाव तथा अधकचरा और अधूरे मन के साथ दिया गया प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण जैसे कारण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • लक्ष्य के भटकाव के साथ ही नये पंचायती राज का जो स्वरूप निर्धारित किया गया है उसमें भी कई तरह की गम्भीर विसंगतियाँ हैं। जिसमें से निम्नलिखित मुख्य हैं—
  1. ग्राम पंचायत का पूरी तरह से कानूनी स्वरूप।
  2. ग्राम पंचायत का प्रतिनिधि लोकतांत्रिक संस्था के रूप में विकास।
  3. ग्राम पंचायतों की सीमा  का विस्तार अर्थात् बड़े आकार की  ग्राम पंचायत।
  4. ग्राम पंचायतों के गठन में बहुमत पर आधारित चुनाव प्रक्रिया पर जोर।
  5. ग्राम पंचायतों को निर्णय में सहमति के स्थान पर बहुमत की महत्ता।
  6. गाँव को नये तरीके से परिभाषित किया जाना।

उपरोक्त आधार पर ग्राम पंचायतों का जो स्वरूप निर्धारित किया गया वह उसके अभीष्ट की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा बन गया है।

  • 73वें संविधान संशोधन के अन्तर्गत पंचायती राज संस्थाओं को जो कार्य या दायित्व सौंपे गये हैं, उनमें भी कई तरह की विसंगतियाँ हैं। जैसे—
  1. सौंपे गये कार्य पंचायतों की एक सीमित भूमिका ही तय कर पा रहे हैं जो मात्र विकास कार्यक्रम तक सीमित हैं।
  2. विकास कार्यक्रम की भी सीमा सरकारी अनुदान और मार्ग-निर्देशन तक ही सिमट कर रह गई है।
  3. पंचायतों का परम्परा से जो समाज के निर्माण व विकास का दायित्व था वह पूरी तरह से उपेक्षित है।
  4. पंचायत की कोई स्वतंत्र भूमिका नहीं। वह राजसत्ता की सहयोगी बनकर रह गई है।
  5. पंचायतों का कार्य भौतिक विकास तक सीमित रह गया है, जबकि मानव विकास उसका प्रमुख कार्य है।
  6. गाँव के विवादों का निपटारा पंचायत की वास्तविक पहचान है लेकिन न्याय का यह दायित्व अधिकांश राज्यों में अभी पंचायतों को सौंपा ही नहीं जा सका है।
  7. 73वें संविधान संशोधन में आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय का जो गुरुतर दायित्व पंचायतों को सौंपने की बात की गई है, उसकी तरफ अभी तक लोगों का ध्यान ही नहीं गया। सिर्फ भौतिक निर्माण का एजेण्डा ही प्रधान है। भूमि सुधार, कृषि विकास, स्वरोजगार तथा सामाजिक कार्यक्रमों की शुरुआत ही नहीं हो पाई है।
  • जहाँ तक पंचायतों को मिलने वाले अधिकार का सवाल है, उसमें भी कई तरह के अन्तराल व विसंगतियाँ विद्यमान हैं। जैसे, पंचायती राज संस्थाओं का अपना स्वयं का प्रशासन-तंत्र न होना, पहले के भी अधिकारों में कटौती हो जाना, कानून की ही भाषा में दायित्वों को निपटाने का प्रयास करना आदि प्रमुख हैं।
  • आर्थिक विकास तथा स्वावलम्बन के कार्यक्रमों का अभाव पंचायतों में व्यापक स्तर पर देखा गया है। इस दिशा में सोच और व्यवहार दोनों के स्तर पर शून्यता ही है। पंचायती राज अधिनियमों में इस दिशा की ओर कोई विशेष प्रयास दिखाई नहीं पड़ता। साथ ही, लोकमानस के स्तर पर भी न तो कोई पहल है और न कोई उत्साह। एक तरह से इस ओर दृष्टि ही नहीं जा रही है। परिस्थितियाँ भी कुछ इस तरह बनती जा रही हैं कि लोगों में इसे लेकर कोई उत्साह ही नहीं है।

सरकारी अनुदानों ने गाँव के लोक-जीवन में जो परावलम्बन का भाव पैदा कर दिया है, उसके चलते वे अपनी वास्तविक शक्ति और क्षमता की समझ भी खोबैठे हैं।

बाजारू संस्कृति ने उनके भीतर जहाँ अर्थगत लाभ-हानि की मानसिकता को जन्म दे दिया है, वही जीवन स्तर का मानक बाहरी वस्तुओं के उपयोग की सामर्थ्य पर अटक गया है। परिणामस्वरूप वे अपनी आमदनी का एक बहुत बड़ा हिस्सा नशाखोरी व फिजूल की चीजों में खर्च कर रहे हैं। जिससे उनका स्वयं का तथा समग्र रूप में गाँव का पूरा अर्थशास्त्र ही बिगड़ गया है।

  • 73वें संविधान संशोधन के अन्तर्गत राज्य के विधानमण्डलों को दिया गया यह निर्देश कि ‘वह ग्राम सभाओं को अधिकार व कार्य सौंपेगी’ के संदर्भ में राज्य अधिनियम में जो थोड़ी-बहुत जिम्मेदारी सौंपी गयी, वह औपचारिकता बनकर रह गयी है। इसमें जहाँ जनता की उदासीनता एक मुख्य कारक है, वहीं दूसरी ओर पंचायत पदाधिकारियों तथा सरकार के स्तर पर भी जानबूझ कर जिम्मेदारी सौंपने से बचा जा रहा है। क्योंकि इससे लोगों की भागीदारी का जो प्रभाव बनेगा वह कहीं-न-कहीं से इन सबकी सत्ता के लिए संकट होगा।
  • वित्तीय नियोजन के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन तो पूरा हो गया है लेकिन अभी भी कोई स्पष्ट तरीका नहीं निकाला जा सका है, जो पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रभावी भूमिका निभाये। राज्य सरकार के आगमों से मिलने वाले हिस्सों का निर्धारण तथा विभिन्न प्रकार के करों को लगाने का अधिकार पंचायतों को सिद्धांतत: तो दे दिये गये हैं लेकिन अभी भी व्यवहार में वह उतर नहीं पाया है। स्वैच्छिक रूप से जन-सहयोग तथा स्थानीय संसाधनों के विकास का पक्ष तो काफी कमजोर है।
  • कहने को तो जिले में जिला योजना समिति का औपचारिक रूप से गठन किया जा चुका है, लेकिन जिस मंशा के साथ संविधान में इसका प्रावधान किया गया है उससे वह कोसों दूर है। गाँव एवं ब्लाक के स्तर से जो योजना बनकर आनी चाहिए वह तो आ नहीं पा रही है ऊपर से इन दोनों स्तरों का कोई प्रतिनिधित्व भी जिला योजना समितियों में नहीं देखने को मिल रहा है। इससे यह सिर्फ खानापूरी होकर रह गई है।
  • पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण तथा गाँव के सामान्य-जनों के लोक शिक्षण का कार्य सरकारों की कार्य-सूची में सबसे नीचे है। जिन राज्यों में इस दिशा में (मात्र पंचायत प्रतिनिधि प्रशिक्षण का कार्य) थोड़ा-बहुत प्रयास हुआ भी है वह या तो आधा-अधूरा रहा या फिर मात्र औपचारिक।
  • स्वैच्छिक संगठनों की भूमिका लोक-शिक्षण के कार्य में सबसे सार्थक हो सकती है। लेकिन अभी तक देखा यही गया है कि ज्यादातर संस्थाएँ सरकारी अनुदानों के माध्यम से औपचारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम (विशेषकर पंचायती राज एक्ट की जानकारी तक) तक सीमित हैं। लोक-शिक्षण के कार्य की ओर तो अभी बढ़ा ही नहीं गया है।
  • सरकार की नीतियों और उसके क्रियान्वयन का जो तंत्र विकसित हुआ है उसमें आम आदमी को सबसे अधिक अविश्वसनीय माना गया है। अधिनियम तथा तंत्र की कार्यप्रणाली के अनेक ऐसे उदाहरण बिखरे पड़े हैं जहाँ लोकमत की अपेक्षा सामान्य सरकारी कर्मचारी का सुझाव ज्यादा मान्य है। आम आदमी के प्रति अविश्वास की नींव पर ही पूरा-का-पूरा सरकारी तंत्र और प्रकारान्तर से आज का पंचायती राज भी खड़ा है।
  • जिला, ब्लाक तथा गाँव स्तर पर नियोजित त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं के बीच कई तरह की गम्भीर विसंगतियाँ विद्यमान हैं। जिससे इनके बीच सही समन्वय या तालमेल नहीं बन पा रहा है। इसका कारण जहाँ एक तरफ अधिनियमों की अस्पष्टता है, वहीं दूसरी ओर व्यावहारिक स्तर पर भी कई तरह की विसंगतियाँ हैं। इससे पंचायती राज का प्रवाह बुरी तरह से बाधित हो रहा है। सभी स्तरों पर समुचित प्रतिनिधित्व का अभाव इसका सबसे बड़ा कारण है।
  • समाज के कमजोर वर्गों एवं महिलाओं के लिए की गई आरक्षण व्यवस्था (जो समय की माँग थी) के कारण भी कई तरह की विसंगतियाँ पैदा हुई हैं। इस आरक्षण को जहाँ राजनैतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है जिससे वातावरण विषाक्त हुआ है, वहीं दूसरी ओर अक्षम प्रतिनिधित्व की अधिकता तथा सही प्रतिनिधि के स्थान पर किसी अन्य द्वारा अधिकारों का उपयोग लोगों में आक्रोश का कारण बना है। यहाँ तक इस क्षेत्र में हो रही अन्य दूसरी बुराइयों या कमियों को नजर अंदाज करके इसी को असफलता का सबसे बड़ा कारण घोषित किया जा रहा है।
  • पंचायतों के माध्यम से संचालित विकास व निर्माण के कार्यों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार एवं कमीशनखोरी की शिकायतें मिल रही हैं। ग्राम प्रधानों/सरपंचों के अनुसार, ‘बिना कमीशन खिलाये योजनाएँ न तो स्वीकृत हो रही हैं और न तो बजट मिल रहा है।’ गाँववासियों की दृष्टि में ग्राम प्रधान विकास के पैसे को स्वयं खा रहा है। इस प्रकार पंचायती राज जो विकास कार्यक्रमों में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए लागू किया गया वह स्वयं भी उसी की दलदल में पँâसता जा रहा है। पारदर्शिता तथा जन-सहभागिता, जो इसको समाप्त करने का सबसे कारगर तरीका है, उसके लिए शासन के स्तर से जो थोड़ा-बहुत प्रयास हो रहा है, उसका अभी कोई प्रभावी व सार्थक रूप सामने नहीं आ पाया है।
  • विकास कार्यक्रम अभी भी नौकरशाही के चंगुल से बाहर नहीं निकल पाया है। सभी स्तरों पर अंतिम निर्णय सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की मर्जी से ही हो रहा है। चूँकि पंचायतीराज के माध्यम से अब इन्हें संचालित होना है, अत: प्रकारान्तर से पंचायतों पर भी नौकरशाही का प्रभुत्व स्थापित है। आम आदमी के प्रति जिस अविश्वास की चर्चा ऊपर की गई है, उसी के चलते पंचायती राज अधिनियम की कई ऐसी धाराएँ हैं जो पंचायती राज संस्थाओं तथा उनके पदाधिकारियों एवं सदस्यों पर पूर्ण नियंत्रण रखती हैं। उनका अंकुश पंचायतों को अपनी सरकार बनाने में सबसे बड़ी बाधा के रूप में पहचाना जा रहा है।
  • पंचायतों के चुनाव से लेकर उसके सामान्य काम-काज तक में धीरे-धीरे राजनैतिक हस्तक्षेप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ता जा रहा है। चुनावों में राजनैतिक दलों की सीधी भागीदारी तथा विकास कार्यक्रमों में बजट और कार्य का निर्णय लेने का अधिकार विधायकों और सांसदों को अपनी निधियों के माध्यम से जो प्राप्त है, उसका राजनैतिक स्वरूप पंचायतों के काम-काज को काफी प्रभावित कर रहा है। धीरे-धीरे पंचायतों के साथ भी एक राजनीतिक दलीय दृष्टि विकसित होने लगी है, जो निश्चय ही घातक है।
  • वर्तमान समय में गाँव जीवन बुरी तरह से बिखर रहा है। इस बिखराव का कारण जहाँ उसके सामान्य जीवन में कानूनी प्रक्रिया की अत्यधिक दखल तथा राजनैतिक चुनाव है, वहीं दूसरी ओर गाँव समाज को जोड़ने वाला जो केन्द्रीय भाव शताब्दियों से धर्म अथवा अध्यात्म के रूप में विद्यमान था उसके प्रति अनास्था या उपेक्षा भी एक प्रमुख कारण है। गाँव समाज के बिखराव के कारण पंचायती राज का वह गुणात्मक स्वरूप विकसित नहीं हो पा रहा है जिसकी कल्पना बापू या विनोबा ने की थी। साथ ही, दूसरी ओर पंचायती राज व्यवस्था की वर्तमान विसंगतियों के चलते गाँव समाज के बिखराव व टूटन की प्रक्रिया और तेज हो गई है।
  • सरकार के स्तर पर इन विसंगतियों को पहचानने और उसके समाधान की कोशिश भी की जा रही है। नये पंचायती राज के लागू होने के एक वर्ष बाद ही आदिवासी क्षेत्र की पंचायतों को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए, जिसके समाधान हेतु भूरिया कमेटी बनाई गई। उसकी संस्तुति के आधार पर पंचायत उपबन्ध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 के माध्यम से एक और संविधान संशोधन हुआ। इसमें ग्राम सभा की सर्वोच्चता स्थापित करते हुए परम्पराओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। यह अलग बात है कि राज्य सरकारों के स्तर से अभी इसे पूरी तरह से व्यवहार में नहीं उतारा जा सका है।
  • इन विसंगतियों को भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने बड़ी गम्भीरता से लिया है। तभी तो वर्ष 1999 को ‘ग्राम सभा वर्ष’ घोषित करते हुए तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री द्वारा समस्त मुख्यमंत्रियों को एक पत्र भेजा गया था जिसमें ग्राम सभा के सशक्तीकरण के लिए कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये गये। यह अलग बात है कि अधिकांश राज्यों में अभी उन सुझावों पर राज्य सरकारों द्वारा कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं की गई है।

73वें संविधान संशोधन में ग्यारहवीं अनुसूची के माध्यम से पंचायतों को सौंपे गये विषय

  1. कृषि, जिसके अन्तर्गत कृषि विस्तार है।
  2. भूमि विकास, भूमि सुधार का कार्यान्वयन, चकबन्दी और भूमि संरक्षण।
  3. लघु सिंचाई, जल प्रबन्ध और जल विभाजक क्षेत्र का विकास।
  4. पशुपालन, डेरी उद्योग और कुक्कुट पालन।
  5. मत्स्य उद्योग।
  6. सामाजिक वानिकी और फार्म वानिकी।
  7. लघु वन उपज।
  8. लघु उद्योग, जिसके अन्तर्गत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी है।
  9. खादी, ग्रामोद्योग और कुटीर उद्योग।
  10. ग्रामीण आवासन।
  11. पेय जल।
  12. ईंधन और चारा।
  13. सड़कें, पुलिया, पुल, फेरी, जलमार्ग और अन्य संचार साधन।
  14. ग्रामीण विद्युतीकरण, जिसके अन्तर्गत विद्युत का वितरण है।
  15. अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत।
  16. गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम।
  17. शिक्षा, जिसके अन्तर्गत प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय भी हैं।
  18. तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा।
  19. प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा।
  20. पुस्तकालय।
  21. सांस्कृतिक क्रिया-कलाप।
  22. बाजार और मेले।
  23. स्वास्थ्य और स्वच्छता, जिसके अन्तर्गत अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और औषधालय भी हैं।
  24. परिवार कल्याण।
  25. महिला और बाल विकास।
  26. समाज कल्याण, जिसके अन्तर्गत विकलांगों और मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों का कल्याण भी है।
  27. दुर्बल वर्गों का और अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन-जातियों का कल्याण।
  28. सार्वजानिक वितरण प्रणाली।
  29. सामुदायिक आस्तियों का अनुरक्षण।

73rd Constitution Ammendment (Panchayati raj ammendment act of 1992)- PDF Download-                     
https://drive.google.com/openid=1XUEV0QQFO_kYbXY7NG9nklzQ3pYt-V-g