संसदीय व्यवस्था और ग्राम स्वराज्य

संसदीय व्यवस्था और ग्राम स्वराज्य

By Dr. Chandra Shekhar Pran

वर्तमान समय में भारत में लोकतन्त्र की संसदीय व्यवस्था के अंतर्गत राज्य का ढांचा कार्य कर रहा है। संसदीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विधायिका के रूप में संसद सर्वोच्य होती है और उसी के सदस्यों से कार्यपालिका अर्थात मंत्रिमंडल का गठन होता है। पश्चिमी लोकतन्त्र की राज्य व्यवस्था के सामान्यतः दो रूप दृ संसदीय व्यवस्था तथा अध्यक्षीय व्यवस्था दृ है । भारत के संविधान में संसदीय व्यवस्था को अंगीकार करते हुए संविधान की प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष डॉण् अम्बेडकर ने संविधान सभा में अमेरिका की अध्यक्षात्मक तथा ब्रिटेन की संसदीय व्यवस्था की तुलना करते हुए यह तर्क दिया था कि असंसदीय कार्यपालिका कम उत्तरदायी होती है दूसरी ओर बहुमत पर आश्रित कार्यपालिका कहीं अधिक उत्तरदायी होती है। अतः यही सोच कर कि अधिक स्थायित्व की जगह उत्तरदायी कहीं अधिक श्रेयष्कर होगाए प्रारूप संविधान में संसदीय कार्यपालिका को अपनाये जाने की अनुशंसा की गयी है।

जबकि दूसरी ओर महात्मा गांधी ने 1909 में हिन्द स्वराज्य में ब्रिटेन कि संसदीय व्यवस्था कि बड़ी तीखी आलोचना की थी। उनके शब्दों में पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा ;वेश्याद्ध है। बांझ इस अर्थ में कि उसने अपने आप में एक भी अच्छा काम नहीं किया और वेश्या इस अर्थ में कि जो मंत्रिमंडल उसे रखे उसके पास वह रहती है। उसका मालिक बदलता रहता है। अपने अनुभवों के आधार पर ब्रिटिश पार्लियामेंट के बारे में उनका कहना था कि बड़े सवालों कि चर्चा जब पार्लियामेंट में चलती है तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर लेटते है या बैठे बैठे झपकियाँ लेते रहते है। उनके अनुसार जितना पैसा और समय पार्लियामेंट खर्च करती हैए उतना पैसा और समय अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाय। गांधी का स्वराज्य जो व्यक्ति के स्तर पर आत्मशासन और आत्मसंयम है तथा समाज के स्तर पर सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने के लिए लगातार प्रयत्न हैए को स्वतंत्र भारत में श्ग्राम स्वराज्यश् के रूप में सत्ता के विकेंद्रीकरण का एक देशज प्रयोग बनाने का लक्ष्य था।

आज आजादी के सत्तर वर्ष बाद देश कि राज्य व्यवस्था में जिस तरह की विकृतियाँ बड़े पैमाने पर उभर कर आयी है उसके परिप्रेक्ष्य में एक बार फिर संसदीय व्यवस्था और ग्राम स्वराज्य का विषय प्रासंगिक हो गया है।

दुनिया में लोकतन्त्र की स्थापना तथा उसके अंतर्गत राज्य सत्ता के संचालन की जो व्यवस्था तलाशी गई उसमे संसदीय व्यवस्था का स्थान प्रमुख रहा। लोकतन्त्र में संसदीय व्यवस्था के अंतर्गत कार्यपालिका का गठन संसद के सदस्यों के बीच से होता है जबकि अध्यक्षतात्मक व्यवस्था में कार्यपालिका का अध्यक्ष का सीधे चुनाव होता है और वही अपनी इच्छानुसार कार्यपालिका के सदस्यों का चयन करता है।

इन दोनों व्यवस्थाओं के प्रतिपक्ष में महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज्य को महत्व दिया है। ग्राम स्वराज्य मूलतः भारत में गाँव के स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की लंबी परंपरा से उपजा विचार है। गांधी जी का शुरू से ही यह आग्रह रहा कि हमारी शासन पद्धति हमारी प्रजा कि प्रकृति के अनुरूप हो क्योकि ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों की शासन पद्धतियाँ उनकी प्रजा की प्रकृति के अनुरूप है।

गांधी ने ग्राम स्वराज्य को मूलतः स्वावलम्बन के विशेष अर्थ में लिया था और यह स्वावलंबन सामाजिकए आर्थिक एवं राजनैतिक सभी क्षेत्रों में था। उनके अनुसार ग्राम स्वराज्य एक ऐसा पूर्व प्रजातन्त्र होगा जो अपनी महत्व कि जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा लेकिन फिर भी बहुतेरी दूसरी जरूरतों के लिए जिसमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा वह परस्पर सहयोग से कम लेगा।

व्यवस्थागत स्वावलंबन कि दृष्टि से उन्होने पंचायत को आधार बनाया। उनके अनुसार गाँव का शासन चलाने के लिए हर साल गाँव के पाँच आदमियों कि एक पंचायत चुनी जाएगी। इस पंचायत को सब प्रकार कि आवश्यक सत्ता और अधिकार होंगे।

इस प्रकार गांधी जी ने पंचायत सरकार के रूप में देश कि शासनगत व्यवस्था कि परिकल्पना की थी। जिसके माध्यम से ग्राम स्वराज्य के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

श्री सक्सेना ने संविधान के गांधीवाद मसौदे के प्रारूप के अनुसार संविधान में राज्य व्यवस्था का जो स्वरूप प्रस्तावित था उसको अपने सुझाव का आधार बनाया।

मद्रास के सम्मानित सदस्य प्रोफेसर एनण् जीण् रंगा ने अंबेडकर के कथन के प्रति अत्यधिक अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि उन्होंने केवल दक्षिण भारत की पंचायतों की उपलब्धियों की जानकारी रखते तो निश्चित रूप से ये बातें न कहते। यदि वे भारत के इतिहास का उसी तरह अध्ययन करते जैसे दूसरे देशों का किया है तो वे निश्चित रूप से ऐसी टिप्पणी न करते। उन्होंने सदन में सवाल खड़ा किया कि क्या हमारे देश में ग्राम पंचायत की नीव के बिना हमारे लोकतंत्र काए हमारे लोगों के लिए अर्थपूर्ण भूमिका निभा पाना संभव होगाघ्
प्रोफेसर रंगा ने स्पष्ट रूप से सुझाव दिया कि प्रत्येक गांव में पंचायतों को सेल्फ गवर्नमेंट के रूप में स्थापित करने का दायित्व राज्यों को सौंपने का निर्देश संविधान में दिया जाना चाहिए। इसी के साथ गांव के सामाजिकए आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर पंचायत को स्वायत्तता दी जाएए जिससे वह हमारे संविधान के ऊपरी ढांचे की नीव बन सके।

मद्रास के ही एक और वरिष्ठ सदस्य एमण् एण् आयंगर ने कहा कि संविधान का आधार स्वायत्त ग्राम गणतंत्र को बनाना हमारी सबसे बड़ी पसंद है। ब्रिटिश शासन के 150 वर्षों में हमारी आधारभूत स्वतंत्रताए विकेंद्रित अर्थव्यवस्था तथा गांव गणतंत्र को नष्ट कर दिया गया है। यह उन्ही की दृष्टि है कि गांव अपने को स्व शासित नहीं कर सकता। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि गांव को सामाजिक ताने.बाने ;फैब्रिकद्ध की इकाई के रूप में देख सकते हैं। गांव की इकाई परिवार है। गांव का पुनर्निर्माण इसी आधार पर किया जाना चाहिए। लेकिन गांव की वर्तमान स्थिति को देखते हुए उन्होंने भी यह सुझाव दिया कि नीति निर्देशक में एक धारा जोडी जाय कि सभी सरकारें भविष्य में ग्राम पंचायत को स्थापित करें तथा उन्हें राजनीतिक स्वायत्तता तथा आर्थिक स्वतंत्रता दे जिससे वे अपने रास्ते से अपने कार्यों को व्यवस्थित कर सके। उन्होंने भविष्य में स्वायत्त पंचायत के आधार पर संविधान के पुनर्निर्माण का सुझाव भी दिया जो पंडित नेहरू के उस कथन के आधार पर था जिसमें उन्होंने 5 वर्ष के लिए संविधान के पारंपरिक ढांचे को सुरक्षित करने की सलाह देते हुए भविष्य में वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई विधायिका द्वारा री.ड्राफ्ट किये जाने या उसमें संशोधन किया जाये जाने की बात की थी।

उड़ीसा के सदस्य माधवराव ने अपने व्यक्तिगत अनुभव का हवाला देते हुए मैसूर सरकार द्वारा गांव समुदाय के पुनर्जागरण तथा ग्राम पंचायत के कार्य में सुधार करने के उल्लेखनीय प्रयास एवं उसकी उपलब्धियों का ब्यौरा प्रस्तुत किया। साथ ही उन्होंने संविधान में सावधानी के साथ उसकी महत्ता को स्वीकारने की सलाह दी।
उपरोक्त सदस्यों के अतिरिक्त बहुत सारे अन्य सदस्यों ने भी ग्राम पंचायत को संविधान में राज्य व्यवस्था का आधार बनाने तथा उसके आधार पर शासन की संरचना को विकसित करने का सुझाव व समर्थन दिया। इन सदस्यों में बाल कृष्ण शर्माए आर के सिद्धवाए सारंग दासए चौधरी रणवीर सिंहए वीण् पिल्लईए दक्षयानि बेलापुधनए महावीर त्यागीए कृष्णस्वामी भारतीए कृष्ण मोहन त्रिपाठीए विशंभर दयाल त्रिपाठीए मारुति सत्यनारायणए सुरेश चंद्र मजूमदार आदि प्रमुख थे।

संविधान में अनुच्छेद 40 को जोड़ा जाना. जैसा कि हमने पूर्व में देखा कि संविधान के प्रारूप के द्वितीय वाचन में भारत के गांव समाज और पंचायत के बारे में की गई प्रतिकूल टिप्पणी से सदस्यों में उपजे आक्रोश और असंतोष के परिणाम स्वरूप ग्राम गणतंत्र के विविध पक्षों पर एक लंबी बहस हुई। बहुत सारे सदस्यों ने अपने अपने तरीके से अंबेडकर के कथन के प्रति असंतोष और अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए गांधी के ग्राम स्वराज्य की अवधारणा के पक्ष में अपना जोरदार समर्थन दिया तथा उसको संविधान में शामिल किए जाने का सुझाव दिया। इसी क्रम में एम ए आयंगर तथा के संथानम की तरफ से एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।

22 नवंबर 1948 को यह प्रस्ताव विधिवत प्रस्तुत हुआ तथा इस पर भी बहस हुई। यह संशोधन नंबर 927 के रूप में एमण् एण् आयंगर के नाम से प्रस्तुत हुआ था। लेकिन सभा की शुरुआत में श्री आयंगर ने सभा के उपाध्यक्ष महोदय से अनुरोध किया कि श्री संथानम द्वारा जो प्रस्ताव दिया गया है उसे ही इसके बजाय सदन में प्रस्तुत किया जाए क्योंकि उसकी भाषा ज्यादा बेहतर है। उपाध्यक्ष महोदय ने उनके इस सुझाव को स्वीकार करते हुए श्री संथानम के संशोधन प्रस्ताव को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किए जाने की अनुमति प्रदान की।
श्री संथानम द्वारा संविधान में एक नये अनुच्छेद 31.। का वह प्रस्ताव रखा जो वर्तमान में नीति निर्देशक सिद्धांत के अंतर्गत अनुच्छेद 40 के रूप में मौजूद है। प्रस्तावित नए अनुच्छेद का प्रारूप इस प्रकार था. श्राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठायेगा और उनको ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हे स्वायत्त शासन मसि ळवअमतदउमदजद्ध की इकाइयों के रूप मेन कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हो।

केण् संथानम ने अपना संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए इसे नीति निर्देशक सिद्धांत के अंतर्गत प्रस्तुत किए जाने के औचित्य को बताते हुए कहा कि चूंकि ग्राम पंचायत का आकार और कार्य प्रांत वार भिन्न प्रकार का है। अतः इसके लिए कोई कठोर और त्वरित निर्देश संविधान में नहीं दिया जा सकता। अतः इसे प्रांतीय विधायिका के ऊपर छोड़ देना चाहिए। इसी अर्थ में राज्य पंचायतों को संगठित करने का कदम उठाए तथा उन्हें सेल्फ गवर्नमेंट की इकाई के रूप में कार्य करने हेतु आवश्यक शक्ति और प्राधिकार प्रदान करें।

डॉ आंबेडकर ने बिना किसी बहस के इसे सहज तरीके से स्वीकार करने की घोषणा सदन में की। उपाध्यक्ष महोदय ने आगे इसको फिर से बहस का विषय ना बनाने के लिए इस पर चर्चा को विराम देने का निर्णय सुनाया लेकिन श्री आयंगर ने इस विषय को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए इस पर पुनः सदस्यों को अपने विचार रखने का अवसर दिए जाने का अनुरोध किया। जिसे उपाध्यक्ष महोदय द्वारा स्वीकार करते हुए सबसे पहले टी प्रकाशम को अपना मत व्यक्त करने को कहा।

टीण् प्रकाशम ने इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल करने की स्वीकृति के प्रति प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि हमें इसे बहुत शुरुआती दौर में ही संविधान के ढांचे में शामिल करना चाहिए था। उन्होंने संविधान सभा के अपने एक सदस्य मित्र के उस कथन का उल्लेख किया जिसमें ग्राम गणतन्त्र के सवाल को बैलगाड़ी के दिनों की बात कह कर उनके सवाल को घेरे में खड़ा किया था। उन्होंने अपने मित्र को इसका जवाब बड़े सटीक तरीके से दिया। उन्होंने गांव के इस सेल्फ गवर्नमेंट को काला बाजारीए अशांति तथा कम्युनिज्म को रोकने का सबसे कारगर आधार बताते हुए इसके समर्थन का मुख्य कारण बताया।

सेठ गोविंद दास ने अपने लंबे वक्तव्य में दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत द्वारा अपने गांवों को एक विशेष महत्व दिए जाने को संदर्भित करते हुए के संथानम के प्रस्ताव का समर्थन किया तथा उम्मीद जताई कि इससे हमारे गांव का प्राचीन वैभव वापस लौटेगा।

इस चर्चा के अंतिम वक्ता के रूप में एल कृष्णा स्वामी भारती ने इस संशोधन का स्वागत करते हुए इस बात पर जोर दिया कि वे इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं है क्योंकि मिस्टर आयंगर के संशोधन प्रस्ताव में राजनीति एवं आर्थिक शक्ति के प्रभावी विकेंद्रीकरण का जो विचार रखा गया था वह इसमें स्पष्ट नहीं है। यह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्रदान करता है जबकि महात्मा गांधी ने भी आर्थिक स्वतंत्रता पर जोर दिया था।
केण् संथानम द्वारा इस संबंध में सफाई देते हुए कहा कि ेमसि.हवअमतदउमदज केवल राजनीति ही नहीं है वह आर्थिक तथा आध्यात्मिक भी है।

इस चर्चा में इसके अतिरिक्त सुरेंद्र मोहन घोषए आई एम पिल्लई तथा डॉक्टर सुब्रमण्यम ने सक्रिय रूप से भाग लिया और इन सभी ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए इसे संविधान के लिए बहुत महत्वपूर्ण अनुच्छेद बताया। इस प्रकार अंततः यह अनुच्छेद संविधान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
इसके उपरांत जब 17 से 26 नवंबर 1946 को संविधान के तीसरे वाचन पर सामान्य बहस हुई तब कई सदस्यों ने अनुच्छेद 31.। पर पुनः अपनी आपत्ति इस विचार के साथ दर्ज कराई की इसमे गाँव और पंचायत को वह स्थान नहीं मिल पाया है जो उसे मिलना चाहिए अर्थात अभी भी वह भारतीय संविधान का मूल आधार नहीं बन पायी है। लेकिन साथ ही इस उम्मीद के साथ इस संशोधन के प्रति अपनी सहमति भी दी कि आने वाले समय में इस गैप को इससे ;अनुच्छेद 31.।द्ध पूरा किया जा सकेगा।

सेठ गोविंद दास का कहना था कि आधुनिक भारत का निर्माण अपनी सभ्यता और संस्कृति के संरक्षण से ही संभव है और यदि इस दृष्टि से हमारे संविधान को देखें तो इसमें बहुत सारी कमियां दिखाई पड़ती हैं।
उड़ीसा के सदस्य श्री लक्ष्मी नारायण साहू ने कहा कि भारत गांव का देश है लेकिन गाँव को सिटीजन में बदल कर उसका अपमान किया जा रहा है। और नागरिको के अधिकार की बात की गई है। अपससंहम.्रमद.ेपच भी अवश्य होनी चाहिएए लेकिन वह संविधान कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा है।

मैसूर राज्य के सदस्य के हनुमंतहैया ने संविधान सभा के सदस्यों के बारे में ही सवाल खड़ा किया। उनके अनुसार जिस तरह सदस्यों की जरूरत थी वैसे सदस्य नहीं हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हम सितार और वीणा का संगीत सुनना चाहते हैं लेकिन यहां तो अंग्रेजी बैंड का संगीत बज रहा है। उनका मानना था यह दोष सदस्यों का नहीं उनका हैए उन्होंने इस कार्य के लिए उनका चयन किया है। विकेंद्रीकरण के सवाल पर उनके अनुसार जो संविधान बना है वह उल्टा पिरामिड है। लेकिन उन्होंने पूरे विश्वास के साथ उम्मीद जताई कि मानवमन और मानवशक्ति एक बड़ा फैक्टर है हमें पूरा विश्वास हैए जब समय आएगा तब वह उसे दुरुस्त कर लेगा।
बिहार के सदस्य प्रोफेसर केण् टीण् शाह ने संविधान में लोकतंत्र के विभिन्न अवयव के बीच पारस्परिक संबंध होने चाहिए उसका यहाँ अभाव है क्योंकि स्थानीय स्व सरकार शक्ति विहीन स्थिति में है। वह शक्ति और कोष के अभाव में दायित्व का प्रभावी तरीके से नहीं कर सकेगी।

श्री आरण् केण् सिद्धवा ने अपने आदर्श और महान नेता महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज्य का संदर्भ देते हुए इस बात का अफसोस जाहिर किया कि स्थानीय निकाय के बारे में यह संविधान चुप है। गांव के स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता को यह संविधान पूरा नहीं करता।

एचण् बीण् कामथ ने यह उम्मीद जताई कि महात्मा गांधी ने लुई फिशर से जिस ग्राम स्वराज्य की बात की थी उसके लिए वह समय आएगा जब भारत मजबूत और स्थायित्व के साथ खड़ा होगा तब पंचायती राज अथवा विकेंद्रित लोकतंत्र के पुरानी योजना को वापस लाया जा सकेगा।

टीण् प्रकाशम ने गहरी संवेदना के साथ कहा कि यह वह संविधान नहीं है जिसकी मैं अपने देश के लोगों के लिए अपेक्षा कर रहा था। उन सब की भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में मेहनत की थी। उनके अनुसार पंचायती राज ही वह एक था जिसे राष्ट्र के लिए नियोजित किया गया था। उन्होंने सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को उस घटना की याद दिलाई जब किसी एक व्यक्ति के पत्र के आधार पर उन्होंने ;सभाअध्यक्षद्ध संवैधानिक सलाहकार को गांव और पंचायत को संविधान का आधार बनाने पर विचार करने हेतु भेजा था। लेकिन उनके उस विचार को अनदेखा करके नेतृत्व ने नीति निर्देशक सिद्धांत में पंचायत को स्थान दिया है। यह वह संविधान नहीं है जिसे इस देश के लोग चाहते थे। नीति निर्देशक सिद्धांतों में पंचायतों को शामिल करने पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि इसका क्रियान्वयन अथवा भरपाई आप पर और उन सब पर निर्भर है जो इस राष्ट्र और सरकार का दायित्व ग्रहण करेंगे। अगर इसे ठीक से लागू किया गया तो भारत का स्वर्णिम समय लौटने में देर नहीं होगी।

अरुण चंद्र गुहा ने भी अपने संबोधन में इस संविधान को स्वतंत्रता आंदोलन की आईडियोलॉजी और लोगों की अपेक्षा के संदर्भ में असफल बताते हुए आर्थिक विकेंद्रीकरण पर आधारित ग्राम पंचायत को ही नये राज्य का आधार बनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि लेकिन इससे हम निराश नहीं हैं। हम जानते हैं कि इतिहास एक विकास प्रक्रिया है मैं सोचता हूं कि हमारे लिए केवल ठहराव के खालीपन की व्यवस्था है। हम इसी से आगे बढ़ेंगे और लोगों की क्रांतिकारी प्रेरणा के आधार पर इस संविधान को ठीक कर लेंगे।
पश्चिम बंगाल के सदस्य एसण् एमण् घोष ने भी यह स्वीकार करते हुए कि यह संविधान अपेक्षा के अनुरूप नहीं है लेकिन यदि हम अपनी ताकत और आत्मा के साथ उस पर काम करेंगे जो संविधान ने पंचायत के आधार पर दिया है तो ईश्वर इच्छा से हम उसे प्राप्त कर लेंगे।

पश्चिम बंगाल के सदस्य उपेंद्र नाथ बर्मन ने पंचायत को नीति निर्देशक तत्वों में शामिल करने से बेहतर भविष्य की उम्मीद करते हुए यह प्रस्ताव रखा कि जितनी जल्दी संभव हो सकेए ग्राम पंचायतों को अधिक से अधिक शक्ति हस्तांतरित कर दी जाय जिससे इस देश कि बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो सके।
मद्रास के सदस्य पीण् कक्कन ने उम्मीद जताई की भारत सरकार देश के प्रत्येक कोने में जातिए पंथ अथवा रंग का भेदभाव किए बिना पंचायत सिस्टम को लाकर गांधी जी के ग्राम स्वराज्य को विकसित करेगी।
बिहार के सदस्य बीण् पीण् झुनझुनवाला के अनुसार संविधान की प्रस्तावना में जिस गणतन्त्र की बात की गई है उसका वास्तविक लोकतन्त्र ग्राम गणतन्त्र की मजबूती से ही संभव हो सकता है। इन्होने डॉ अंबेडकर के उस कथन का जिसमें देश की सुरक्षा में गाँव की भूमिका न होने की बात की गईए का विरोध करते हुए स्वतन्त्रता आंदोलन में गाँवों की महत्वपूर्ण भूमिका को संदर्भित किया।

उड़ीसा के सदस्य नाद किशोर दास ने संविधान को देश में नए उत्साह पैदा करने में असफल बताते हुए उसमें गांधीवादी दृष्टिकोण के अभाव को विशेष रूप से रेखांकित किया।
श्री कमलापति त्रिपाठी ने संविधान के केंद्रीकृत स्वरूप को निष्प्रभावी और खतरनाक बताते हुए सदन से अपील की कि सामान्य व्यक्ति का संविधान बनाया जाय जिससे लोगों को शक्ति प्राप्त हो।
मद्रास के सदस्य एलण् कृष्णास्वामी भारती ने गांधीवादी आदर्श को संविधान का आधार न बनाए जाने के प्रति अपराध को स्वीकार करते हुए कहा कि विकेंद्रित लोकतन्त्रए आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ जीवन कि मूल भूत आवश्यकताओं भोजन और वस्त्र जैसे चीजों को भी इसमें शामिल नहीं किया गया है।

संविधान के इस तीसरे वाचन में उपरोक्त सदस्यों के अतिरिक्त और कई सदस्यों ने इसी प्रकार के विचार व्यक्त की। इसमें केण् टीण् शाहए शंकर राव देवए एसण् नागप्पाए जसवंत राय कपूरए अलगूराम शास्त्रीए पीण् एसण् देशमुखए सीताराम जाजुए श्याम नन्दन सहायए लोकनाथ मिश्रए गोपाल नारायणए एसण् वीण् कृष्णमूर्ति रावए केण् वीण् धूलेकरए पीण् केण् सेनए बलवंत सिन्हा मेहताए दीप नारायण सिन्हाए बालेश्वर प्रसादए जीण् दुर्गाबाईए सतीश चन्द्र सामन्तए रामचन्द्र उपाध्यायए महावीर त्यागी आदि प्रमुख थे।
26 जनवरी 1950 मे संविधान लागू हो गया। वही दूसरी ओर अंग्रेजी काल में बने विभिन्न प्रान्तों के पंचायत राज अधिनियमों को स्वतन्त्र भारत के राज्यों में थोड़े बहुत संशोधन के साथ लागू किया गया। संसदीय व्यवस्था तथा पंचायतीराज व्यवस्था साथ साथ देश में संचालित होने लगी। 1952 में पहली बार वयस्क मताधिकार के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा विधायिका ;लोकसभाद्ध का विधिवत चुनाव हुआ और संसदीय व्यवस्था की कार्यपालिका ;मंत्रिमण्डलद्ध का भी गठन हुआ। देश के नवनिर्माण तथा आर्थिक विकास को प्राथमिकता देते हुए अनेक तरह के कल्याणकारी कार्यक्रमों की शुरुआत की गई। सामुदायिक विकास कार्यक्रम के रूप में एक अत्यंत व्यापक व महत्वाकांक्षी कार्यक्रम संचालित हुआ जिसमें लोक भागीदारी को सबसे अधिक प्रोत्साहित करने का लक्ष्य शामिल था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की यह सबसे अधिक प्राथमिकता का कार्यक्रम था। 4 साल बाद जब 1956 में उनके द्वारा इसकी समीक्षा की गई तो पाया गया कि यह लक्ष्य से काफी पीछे है और उसका सबसे बड़ा कारण लोगों कि भागीदारी का अभाव था। यह पूरा कार्यक्रम नौकरशाही के द्वारा ही संचालित होता रहा। इसी के बाद स्थिति के बदलाव हेतु सुझाव के लिए बलवंत राय मेहता कमेटी बनाई गई जिसने पंचायत व्यवस्था को नया स्वरूप देने तथा उसे प्रभावी तरीके से लागू करने का सुझाव दिया। 1959 में उनके द्वारा त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था की एक नए रूप में शुरुआत की गयी।

पंडित नेहरू द्वारा शुरू हुई पंचायत व्यवस्था वैसे तो बकौल बलवंत राय मेहता लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के लक्ष्य को लेकर स्थापित होनी थीए लेकिन वह विकास कार्यक्रमों में जन सहभागिता के इर्द.गिर्द ही सिमट कर रह गई थी जिसके चलते इसे प्रशासनिक विकेंद्रीकरण के रूप में ही मोटे तौर पर जाना जाता है।
गांधी के ग्राम स्वराज्य के सपने को उनके बाद जेण् पीण् और विनोवा ने पूरी निष्ठा और समझ के साथ साकार करने की कोशिश की थी। विनोवा जहां उसके सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष पर जोर दे रहे थे वहीं जेण् पीण् उनके राजनैतिक व सामुदायिक चरित्र पर अपने को केंद्रित किए हुए थे।
जयप्रकाश जी का मानना था कि राजनीति के क्षेत्र में यदि हम चाहते हैं कि हमारी राजनीतिक संस्थाओं की गहरी जड़ जमें और वे बुनियादी निष्ठाओं के अधिकारी बने तथा हमारे समष्टिगत अस्तित्व की वास्तविक अभिव्यक्तियों का रूप ले तो ग्राम पंचायतों को उनके संपूर्ण गौरव तथा समस्त अतीत कालीन सत्ता के साथ पुनर्जीवित करना ही होगा। उनके अनुसार पंचायतों को राजस्वए कार्यवाहक तथा न्यायिक इन सभी की सत्ता का प्रयोग करने का अधिकार मिलना चाहिए। भारतीय सोशलिस्ट पार्टी के घोषणा पत्र में जेण् पीण् के उन आर्थिक विचारों का काफी विस्तार से देखा जा सकता है जिसमें ग्रामपंचायतों के माध्यम से गांव की समृद्धि का खाका खींचा गया है। विकेंद्रित अर्थरचना के विचार को उन्होंने बड़ी स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया है। ;पृष्ठ 20द्ध

लेकिन जैसा कि हम जानते है कि भारत के संविधान में संसदीय व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। यदि हम इस पर विचार करें कि वह कौन सी स्थितियां और परिस्थितियाँ थी जिसके चलते भारत के संविधान में संसदीय व्यवस्था का प्रावधान हुआ वो इसकी लंबी पृष्ठभूमि दिखाई पडती है। 1857 कि क्रांति के बाद जब 1858 में ब्रिटिश गवर्नमेंट ने भारत कि सत्ता अपने हाथों में ली तो तभी से भारत के बारे में निर्णय लेने का अधिकार ब्रिटिश पार्लियामेंट को सीधे प्राप्त हो गया और इसी के साथ भारत के अंदर कानून के शासन का प्रयास भी शुरू हो गया। इसके अंतर्गत जहां पर एक ओर 1860 की भारतीय दंड संहिता से लेकर 1920 से शुरू हुए पंचायत राज अधिनियमों के माध्यम से भारत के लोगों के व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में क़ानूनों कि भरमार होनी शुरू हो गयीए वहीं दूसरी ओर भारतीय परिषद एक्ट 1861 तथा भारत शासन एक्ट 1909ए तथा भारत शासन एक्ट 1935 जैसे कानूनी प्रावधानों से देश की राजनैतिक एवं प्रशानिक व्यवस्था को एक आकार देने कि कोशिश हो रही थी। ये सभी रिपोर्ट तथा एक्ट ब्रिटिश संसद और उसके शासन के द्वारा अँग्रेजी राज्य को सुदृढ़ तथा लोकप्रिय बनाने के क्रम में किए जा रहे थे जो वहाँ कि संसदीय व्यवस्था को प्रकारांतर से भारत वर्ष के राजनीति एवं सामाजिक जीवन का एक हिस्सा बनाने का प्रयास था। उस समय के अधिकांश राष्ट्रीय नेता प्रांतीय असेंबलियों के माध्यम से इस राजनीति व्यवस्था के अंग बनते जा रहे थे। ब्रिटेन की यह संसदीय प्रणाली भारत वर्ष के राजनीतिक जीवन तथा उसकी कार्य पद्धति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही थी। इसका प्रभाव यह हो रहा था कि कांग्रेस पार्टी भी अपने प्रस्ताव में इस की मूल अवधारणा वयस्क मताधिकार तथा विधान सभाओं के प्रत्यक्ष चुनाव को अपने स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य मांगों में शामिल कर लिया था। तभी तो उसके शुरुवाती दौर से ही वयस्क मताधिकार की मांग एक अनिवार्य शर्त के रूप में प्रस्तुत की जाने लगी थी और इस भागीदारी की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति बनती जा रही थी। प्रांतीय सरकारों के गठन के साथ यह पूरी तरह से व्यावहारिक भी होने लगी थी। इस प्रकार संसदीय प्रणाली तत्कालीन भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गयी थी।

विनोवा भावे ने पंचायत को परिवार भावना के साथ जोड़ते हुएण्ण्ण्ण्ण्।
जेण् पीण् मूलतः ग्राम पंचायत को सहभागी लोकतंत्र के रूप में देखते थे जो ग्राम स्वराज्य की मूल आत्मा थी। वे भी संविधान सभा के उन तमाम सदस्यों की तरह जिन्होंने विकेंद्रीकरण और ग्राम गणतन्त्र की मांग उठाई थी. भारतीय संविधान को उल्टे पिरामिड के रूप में ही देखते थे। संविधान लागू होने के 10 वर्ष बाद के अनुभव को समेटते हुए उन्होंने कहा था कि जनता ने अर्थात बीस करोड मतदाताओं ने यह अनुभव किया है कि वे इस संपूर्ण प्रक्रिया में अलग छोड़ दिए गए हैं। उनकी शिकायत है कि अंग्रेजी राज के समय में जिस ढंग से और जिस प्रकार के लोगों का शासन उन पर चलता थाए वैसा ही अब भी चल रहा है।

उनका मानना था कि प्रत्येक बालिग भारतीय को वोट देने का अधिकार होने के मात्र से पिरामिड अपने चौड़े आधार पर खड़ा नहीं हो जाता। करोड़ों व्यक्ति और अस्त व्यस्त मतदाता बालू के कणों के ढेर के समान हैं जो किसी इमारत की बुनियाद नहीं हो सकते। इन आंकड़ों को ईट बनाना होगा और उन्हें ठोस ढांचे में ढालना होगा। उन्होंने इसका तरीका बताते हुए कहा था कि वर्तमान लोकतंत्र के ऊपर के चौड़े स्तरों में काफी काट.छांट कर विशाल ऊंची मंजिलों के बड़े बड़े हिस्सों को जमीन पर लाने की जरूरत है जिससे कि लोकतंत्र का पिरामिड वास्तविक पिरामिड.यानी ऊपर संकरा और आधार पर चौड़ा पिरामिड बन सके।

इस क्रम में उन्होंने बलवंत राय मेहता के सुझाव तथा पंडित नेहरू के प्रयास की प्रशंसा करते हुए लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को सहभागी लोकतंत्र की बुनियाद डालने की दिशा में उठाया गया कदम बताया। लेकिन जैसा कि पूर्व में कहा गया है कि यह प्रयास प्रशासनिक विकेंद्रीकरण तथा विकास में जनसहभागिता तक ही सिमट कर रह गया था। जेण् पीण् भी इसके मर्म को गहराई से समझ गए थे। तभी तो उन्होंने अपने संबोधन में यह चेतावनी देने लगे थे कि इसका ;पंचायत राजद्ध उद्देश्य प्रशासन के निचले स्तरों पर केवल पद्धतिगत सुधार करना नहीं बल्कि जनता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक क्रांति का सूत्रपात करना है।

इसी अर्थ में वे पंचायती राज को सच्चे सहभागी लोकतंत्र का आधार बनाने पर जोर दे रहे थे। लेकिन इसी के साथ उसके लिए जनता के लोक शिक्षण को सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य मानते थे। उन्होंने लोक शिक्षण के अतिरिक्त सहभागी लोकतन्त्र के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु पांच और शर्तें रखी थी। पहली यह कि राजनीतिक दलों का पंचायती राज संगठनों में हस्तक्षेप ना होए सत्ता का वास्तविक विकेंद्रीकरण होए स्थानीय सत्ता के पास साधनों का नियंत्रण होए उसके अधीनस्थ शासनतंत्र के अधिकारी व कर्मचारी उसके प्रति जवाबदेह हों तथा बुनियादी इकाई ग्राम पंचायत को लोकतांत्रिक मूल्यों का मापदंड माना जाए।

इस सबके निष्कर्ष के रूप में उन्होंने वयस्क लोगों के समूह. ग्राम सभा. को एक विधिक सामूहिक निकाय के रूप में गठित करने का सुझाव भी दिया। साथ ही ग्राम पंचायत को ग्राम सभा की कार्यकारिणी के रूप में प्रस्तुत किया था।

वास्तव में यदि देखें तो संविधान के अनुच्छेद 40 के द्वारा ग्राम पंचायत को सेल्फ गवर्नमेंट की इकाई के रूप में संगठित और विकसित करने की जो जिम्मेवारी केंद्र और राज्य सरकारों को सौंपी गई थीए जेण् पीण् ने अपने उपरोक्त कथनों एवं सुझावों में ग्राम स्वरराज्य के ग्राम गणतंत्र का एक रोडमैप दे दिया था।
उन्होंने सहभागी लोकतंत्र को ही सत्ता के वास्तविक विकेंद्रीकरण का स्वरूप मानते हुए कहा था कि लोकतंत्र का ढांचा ग्रामसभा से लोकसभा तकए कई मंजिलों से बनता है और चूंकि प्रत्येक मंजिल के अधिकारए कृत्यए कर्तव्य और साधन स्पष्ट परिभाषित होते हैंए इसलिए इस व्यवस्था में सत्ता का विकेंद्रित होना अनिवार्य ही है। 51द्ध

इस सबके लिए उन्होंने संविधान विशेषज्ञों का आवाहन करते हुए कहा था कि उन्हें इस प्रश्न पर गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए कि संविधान को कैसे संशोधित किया जाय कि यह विचार उसमें समाविष्ट किया जा सके तथा पंचायती राज को उसमें योग्य स्थान और दर्जा मिले। ;ब्ण् 94द्ध

वनतबमरू ।तजपबसम च्नइसपेमक पद डंदजींद डंहं्रपदम डंतबी म्कपजपवदण् ठल ब्च्तंद

English Version : Parliamentary System adn Gram Swarajya

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